गोरखनाथ मंदिर कथा
युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 55 वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 10 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के दूसरे दिन श्री राममंदिर गुरुधाम वाराणसी से पधारे श्रीमद्जगतगुरु अनंतानंद द्वाराचार्य काशीपीठाधीश्वर स्वामी डॉ रामकमल दास वेदांती जी महाराज ने व्यास पीठ से कहा कि जिस प्रकार से पृथ्वी में विद्यमान षड् रसों की अनुभूति स्वयं नहीं होती, उसकी हमें विभिन्न फलों के बद्वारा अनुभूति होती हैं उसी प्रकार से संसार के जन्म, स्थिति व लय के कारण रूप परमात्मा संसार के कण कण में विद्यमान होते है परंतु उनकी अनुभूति भक्ति रूपी फल के द्वारा ही भक्त जन करते हैं। वही परमात्मा स्वराट( सम्राट) है अर्थात् राजाओं का भी राजा है जिस परमात्मा ने इस संसार को पृथ्वी, जल ,तेज, वायु और आकाश इन पंच महाभूतो को मिलाकर बनाया हैं। उस परम तत्व परमात्मा को इस भागवत कथा के माध्यम से पाया जा सकता हैं। समस्त शास्त्रों का सार व परम श्रेय तत्व श्री कृष्ण की भक्ति हैं। हमें अहंकार का त्याग करके भगवान के शरण में जाना चाहिए। कथा व्यास ने “ये गर्व भरा मस्तक मेरा, प्रभु चरण धूलि तक झुकने दो ” गाकर मंत्र मुग्ध कर दिया।
गोरखनाथ मंदिर
कथा व्यास ने कहा कि हर किसी के वस्त्र अथवा जूते चप्पल धारण नही करने चाहिए क्योंकि इससे आपके अंदर उसके दुर्गुण आ जाया करेंगे ।कोशिश करना चाहिए कि आप अपने ही आसन पर बैठे । अध्यात्म जिस क्षेत्र में जाता है अपने में उस क्षेत्र को रंग देता है। अध्यात्म राजनीति में अथवा व्यापार में आएगा तो उसे भी अपने रंग में रंग देगा और चारों तरफ प्रसन्नता होगी। मृत्यु एक महोत्सव है क्योंकि यह नए जीवन की शुरुवात है अथवा मोक्ष की प्राप्ति है।
श्रीमद्भागवत महापुराण केवल कागजों से बना ग्रंथ ही नहीं हैं अपितु भगवान श्री कृष्ण की वाङ्मयी मूर्ति है। यह ग्रंथ साधन साध्य नहीं हैं, अपितु भगवत कृपा साध्य हैं। यह भागवत कथा तभी सार्थक होती हैं जब वक्ता और श्रोता दोनों प्रबुद्ध व श्रद्धावान हों। जिसका चरित्र व आचार_विचार अच्छा नहीं होगा, उसको भगवान के नाम जप करने पर भी भगवान की प्राप्ति नहीं होती है ।
कथा व्यास ने भागवत में वर्णित संसार के सबसे बड़े धर्म को बताते हुए कहा कि परोपकार से बड़ा कोई धर्म नही होता और पर पीड़ा से बड़ा कोई अधर्म नहीं होता। जीवन में कभी दुःख आए तो सबको बताना नहीं चाहिए, उसे अपने मन में ही रखिए, और समय आने पर सदगुरु को अथवा भगवान को ही सुनाना चाहिए, क्योंकि और कोई आपका दुःख जानता है तो उसे बांटता नहीं अपितु खुश होता हैं। कुंती जैसी भगवान की भक्ता जो भगवान से अपने जीवन में दुखों को मांगती हैं क्योंकि विपत्तियो में भगवान की याद हमेशा आती रहती है। भक्तों को भगवान का दो तरह से दर्शन करना चाहिए, एक स्थूल रूप से संसार के सभी जीव- जन्तुओं, वनस्पतियों में भगवान का दर्शन करें तथा दूसरा सूक्ष्म रूप में ईड़ा-पिंगला नाड़ियों के समागम से ब्रह्मरंध्र में मन का प्रवेश कराकर वहां स्थित सूक्ष्म तत्व का दर्शन करें ।
उन्होंने कहा कि जो कहते हैं कि ईश्वर नहीं है, उन्हें समझना चाहिए । जिस प्रकार अनेक फूलों से बनी माला धागे के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार से अनेक पदार्थों से बना संसार का ईश्वर के बिना रहना संभव नहीं है । धागे की तरह ईश्वर दिखता नहीं, किंतु सब के अंदर वह परम तत्व विद्यमान रहता है।
कथा का समापन आरती और प्रसाद वितरण से हुआ। संचालन डॉ अरविंद चतुर्वेदी ने किया इस अवसर पर गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ जी, महन्त राममिलन दास, योगी धर्मेन्द्रनाथ, श्री राम लखनदास तथा यजमानगण श्री अवधेश सिंह, श्री प्रदीप जोशी, श्री जितेन्द्र बहादुर सिंह , महेश पोद्दार आदि उपस्थित रहे।
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