सतत एवं समावेशी विकास में अन्त्योदय की भूमिका‘ विषय पर व्याख्यान का हुआ आयोजन
गोरखपुर।दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय गोरखपुर के समाजशास्त्र विभाग एवं प्राचीन इतिहास विभाग के सयुक्त तत्वावधान में युगपुरुष महन्त दिग्विजयनाथ स्मृति व्याख्यानमाला: 2024-25 के अन्तर्गत ‘सतत एवं समावेशी विकास में अन्त्योदय की भूमिका‘ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया।
मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. ईश्वरशरण विश्वकर्मा, पूर्व अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग ने कहा कि अन्त्योदय की धारणा समाज के अन्तिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के विकास की बात करता है। अन्त्योदय को यदि समझना है तो हमें पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के जीवन को समझना चाहिए। एकात्म मानव का विचार एक ऐसे व्यक्ति की अवधारणा में निहित है जो व्यक्तित्व की सच्ची भावना उकेरता है और अपनी आकांक्षाओं में प्रामाणिक रहता है। वास्तव में हमारी आवश्यकताओं के अनुकूल एक ऐसी आर्थिक प्रणाली का गठन किया जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य एक तरफ लोगों की न्यूनतम आवश्यकताओं को सुरक्षित रखना और दूसरी तरफ राष्ट्रीय अखण्डता को भी सुरक्षित रखना संभव हो सके। अन्त्योदय की कल्पना प्राचीन है, आपातकाल के बाद अन्त्योदय अन्न योजना की शुरूआत की गई। सन् 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसे 42 प्रकल्प शुरू किये है, जो अन्त्योदय को केन्द्र में रखकर है। पं. दीनदयाल जी ने अपने विद्यार्थी जीवन में एक जीरो एसोसिएशन बनाया जिसके अन्तर्गत कमजोर बच्चों की कक्षाएॅ मेधावी बच्चों द्वारा अलग से ली जाए ताकि वे बच्चें भी सबके बराबर हो सके।
मुख्य अतिथि प्रो. डी. आर. साहू, विभागाध्यक्ष समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ ने कहा कि आज के समय में वैश्विक बाजार समाज पर हावी है। आज के समकालीन भारत को समझने के लिए वर्तमान समस्याओं को भी जानने की जरूरत है। अन्त्योदय की अवधारणा समावेशी विकास और सतत विकास के उद्देश्य से सामाजिक आर्थिक स्थिति में अन्तिम व्यक्ति की पहचान करने के लिए है। किसी भी आर्थिक व्यवस्था के पीछे तर्क यह है कि वह सभी को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सक्षम है। आत्मनिर्भर उत्पादन प्रक्रिया में काम की गारंटी की अनिवार्यता को मान्यता दी गई, जबकि इसके विपरीत ऐसी व्यवस्था जो लोगों की उत्पादन गतिविधि को बाधित करती है, वह आत्मविनाशकारी है। मनुष्य की समस्याओं को कम करके मानवतावाद को ऊपर लाने का प्रयास ही अन्त्योदय की धारणा है। अन्त्योदय मात्र मानव संबंधो के लिए ही नही है। वर्तमान समय में हमें ज्ञान के ऐसे स्वतन्त्र बहाव को सम्पादित करना होगा जहॉ संवाद में किसी प्रकार का भय न व्याप्त हो।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि आज भारत के संस्कार व दुनिया के बाजार का द्वंद है। उन्होंने विकास के स्वदेशी प्रतिदर्श को रेखांकित करते हुए कहा कि विदेशी का स्वदेशानुकूल और स्वदेशी का युगानुकूल पालन होना चाहिए। समाज के अन्तिम व्यक्ति से त्याग की अपेक्षा करना न्यायपरक नही है। विकास परिवर्तन की एक विशिष्ट अवस्था है लेकिन सिर्फ परिवर्तन विकास की गांरटी नहीं है। वास्तव में प्रगति के साथ परिवर्तन विकास है और पतन के साथ परिवर्तन विनाश है। भारतीय ऋषियों ने कहा कि हमें प्रकृति के साथ साहचर्य बनाकर संयमित उपभोग करना चाहिए। समाज में जब सामान्य इच्छा होगी तो प्रत्येक व्यक्ति स्वयं पर शासन करेगा।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. डॉ. अर्चना सिंह ने किया तथा आभार ज्ञापन डॉ. सुरेन्द्र चौहान ने किया। उक्त अवसर पर डॉ. विवेक शाही, डॉ. इन्द्रेश पाण्डेय, श्री विवेकानन्द, डॉ. धीरज सिंह, डॉ. पवन पाण्डेय, डॉ. सुनील सिंह, डॉ. त्रिभुवन मिश्रा, डॉ. सरिता सिंह, डॉ. समृद्धि सिंह, डॉ. शिव कुमार, श्री आशुतोष दूबे, श्री शुभम पाण्डेय सहित महाविद्यालय के शिक्षक व शिक्षणेत्तर कर्मचारी व विद्यार्थी उपस्थित रहे।

