यूनिवर्सिटी की रेट-2023 परीक्षा में घोटाले का आरोप, NET-JRF पास कैंडिडेट्स को किया बाहर
गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी की रिसर्च एलिजिबिलिटी टेस्ट (रेट-2023) परीक्षा में बड़े घोटाले का आरोप सामने आया है। ललित एवं मंच कला विभाग में लिखित परीक्षा के बाद मेरिट लिस्ट में अनियमितताओं की खबरें सामने आ रही हैं। NET-JRF पास कैंडिडेट्स का दावा है कि उन्हें लिखित परीक्षा में अच्छे अंक मिलने के बावजूद इंटरव्यू में जानबूझकर कम अंक देकर मेरिट लिस्ट से बाहर कर दिया गया। वहीं, कुछ कैंडिडेट्स, जिन्हें लिखित परीक्षा में कम अंक मिले थे, उन्हें इंटरव्यू में उच्च अंक देकर शीर्ष स्थान पर लाया गया है। इस घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय की चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं और छात्रों के बीच गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है।
इस विवाद के केंद्र में कैंडिडेट्स की शिकायतें हैं, जिन्होंने आरोप लगाया है कि उनकी मेहनत और योग्यता के बावजूद उन्हें अन्याय का सामना करना पड़ा है। कैंडिडेट्स का कहना है कि वे सभी NET और JRF की परीक्षा पास कर चुके थे, और उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं होने के कारण उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा। यह मामला विश्वविद्यालय के प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है और छात्रों का विश्वास संकट में डालता है। शिकायतकर्ता कैंडिडेट्स का बयान
कई कैंडिडेट्स, जिनमें दयाशंकर, राज चौबे और दीपिका गुप्ता शामिल हैं, ने वाइस-चांसलर प्रो. पूनम टंडन को लिखित शिकायत दी है। शिकायत में दयाशंकर ने आरोप लगाया है कि उन्हें लिखित परीक्षा में 110 अंक मिले थे, लेकिन इंटरव्यू में मात्र 11 अंक दिए गए। इसी प्रकार, राज चौबे को लिखित परीक्षा में 116 अंक मिलने के बावजूद इंटरव्यू में सिर्फ 2 अंक दिए गए। दीपिका गुप्ता को 118 अंक प्राप्त होने पर भी इंटरव्यू में मात्र 5 अंक दिए गए। इन शिकायतों से साफ पता चलता है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है और जानबूझकर कुछ उम्मीदवारों को उच्च अंक देकर मेरिट में स्थान दिलाया गया है।
अन्य कैंडिडेट्स की स्थिति
दूसरी ओर, कुछ कैंडिडेट्स, जिन्हें लिखित परीक्षा में अपेक्षाकृत कम अंक मिले थे, उन्हें इंटरव्यू में 40 अंक तक देकर मेरिट में ऊपर लाया गया है। यह स्थिति इस बात को उजागर करती है कि चयन प्रक्रिया में पक्षपात और अनियमितताओं का मामला गंभीरता से उठता है। कैंडिडेट्स का कहना है कि यह न केवल उनके साथ अन्याय है, बल्कि यह पूरी प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिह्न लगाता है। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर कैसे कुछ कैंडिडेट्स को बिना किसी उचित कारण के इतनी उच्च रैंकिंग मिल गई।
गाइडलाइंस की अनदेखी
कैंडिडेट्स का आरोप है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव था। उनका कहना है कि यूनिवर्सिटी के गाइडलाइंस के अनुसार NET और JRF क्वालीफाई कैंडिडेट्स को एडमिशन में प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका सीधा अर्थ है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी की है, जिससे छात्रों में हताशा और नाराजगी का माहौल बन गया है। कैंडिडेट्स ने मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। यदि उन्हें न्याय नहीं मिला, तो वे उच्च अधिकारियों और न्यायालय का सहारा लेने की योजना बना रहे हैं।
यूनिवर्सिटी प्रशासन की प्रतिक्रिया.
इस मामले के बढ़ते विवाद को देखते हुए यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया है। रजिस्ट्रार प्रो. शांतनु रस्तोगी ने बताया कि कैंडिडेट्स की शिकायतों को ध्यान में रखते हुए पीएचडी के दृश्यकला विभाग में डॉक्युमेंट्स वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को फिलहाल सस्पेंड कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि संबंधित विभाग से रिपोर्ट मांगी गई है और मामले की गहन जांच की जाएगी। प्रो. रस्तोगी ने आश्वासन दिया कि पीएचडी में एडमिशन पूरी तरह से यूनिवर्सिटी के गाइडलाइंस के अनुसार ही होगा और किसी भी प्रकार की अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यूनिवर्सिटी प्रशासन पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और कैंडिडेट्स की सभी शिकायतों का उचित निवारण किया जाएगा।
छात्रों का आक्रोश
कैंडिडेट्स के बीच इस घटना के खिलाफ गहरा आक्रोश है। कई छात्रों का कहना है कि उनकी मेहनत का अपमान किया गया है। छात्रों का कहना है कि वे अपनी मेहनत और योग्यता के अनुसार मान्यता प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम कर रहे थे, लेकिन अब उन्हें इस प्रकार का अन्याय सहना पड़ रहा है। कैंडिडेट्स ने इस घटना को एक बड़ी विफलता के रूप में देखा है और उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि वे इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं।
छात्रों में इस विवाद को लेकर गहरा आक्रोश देखा जा रहा है। उनका मानना है कि इस मामले में प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए और दोषियों को सजा देनी चाहिए। कैंडिडेट्स का कहना है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे उच्च स्तर तक इस मुद्दे को उठाने के लिए मजबूर होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे न्याय के लिए अन्य माध्यमों का सहारा लेने के लिए तैयार हैं।
पारदर्शिता की आवश्यकता.
इस घटनाक्रम ने यूनिवर्सिटी के चयन प्रक्रिया और प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कैंडिडेट्स का आरोप है कि उनकी मेहनत और योग्यता को नजरअंदाज किया गया है। यह मामला उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखें और सभी उम्मीदवारों के लिए समान अवसर प्रदान करें। यह घटना केवल एक विश्वविद्यालय की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा प्रणाली की कमजोरी को उजागर करती है। भारत में शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है, ताकि छात्रों को उनकी मेहनत और योग्यता के अनुसार मान्यता मिले। शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां छात्रों को उनकी मेहनत का उचित फल मिलना चाहिए। यदि शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी होगी, तो यह समाज पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
निष्कर्ष
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी की रेट-2023 परीक्षा में उठे विवाद ने उच्च शिक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। कैंडिडेट्स के आरोप और उनके साथ हुए अन्याय ने यह साबित कर दिया है कि अभी भी हमारे सिस्टम में सुधार की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय प्रशासन को इस मामले में उचित कदम उठाने चाहिए और सभी कैंडिडेट्स को न्याय प्रदान करना चाहिए, ताकि छात्रों का विश्वास सिस्टम में बना रहे और वे अपनी मेहनत के फल को प्राप्त कर सकें। इस घटना से शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता और पारदर्शिता की महत्वपूर्णता को रेखांकित किया गया है, जिससे भविष्य में ऐसे विवादों की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।
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