यतीमखाने वाले वक़्फ़ नम्बर 87 का हाल बेहाल,
वक़्फ़ डीड के विपरीत यतीमों के वक़्फ़ पर मोतवल्ली का कब्ज़ा,
वक़्फ़ की अन्य सम्पत्तियों पर भी काबिज़ हैं हारिस मोतवल्ली,
मनव्वर रिज़वी,
गोरखपुर । जिले में बड़ी संख्या में ऐसी वक़्फ़ सम्पत्तियां है जिसपर एक व्यक्ति या परिवार का कब्ज़ा है।
ऐसा ही एक वक़्फ़ है जो सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड में वक़्फ़ खान बहादुर मौलवी हमीदुल्लाह खान, वक़्फ़ नम्बर 87 दर्ज है। जिसको यतीमखाने वाले वक़्फ़ के नाम से लोग जानते और पहचानते हैं । शहर के जाफरा बाज़ार में कर्बला रोड पर कभी यतीमखाना हुआ करता था जो अब इतिहास में कहीं खो गया है।
एक अनुमान के मुताबिक इस वक़्फ़ में 2 से ढाई हजार एकड़ ज़मीन दर्ज है। जिसको खान बहादुर मौलवी हमीदुल्लाह ने सन 1941 में रजिस्टर्ड डीड के माध्यम से वक़्फ़ किया था जो वर्तमान में गोरखपुर और बस्ती मण्डल में फैली है।
कौन है यतीमखाने वाले वक़्फ़ का मोतवल्ली,
महबूब सईद हारिस इस वक़्फ़ के मोतवल्ली हैं, जबकि उससे पहले इनके पिता हामिद अली इस वक़्फ़ के मोतवल्ली हुआ करते थे।
महबूब सईद हारिस के बारे में यह कहना गलत नही होगा कि गोरखपुर जिले के अधिकांश बड़े वक़्फ़ इनके कब्ज़े में या उनमे इनका दखल है।
हारिस बाबू की गिनती शहर के बड़े मुस्लिम रईसों में होती है। वर्तमान में यह मियां साहब इस्लामियां इंटर कालेज के प्रबंधक हैं, इसके अलावा अंजुमन इस्लामियां व जव्वाद अली शाह पीजी कालेज की कमेटी में भी इनका दखल है।
मोतवल्ली व इंतजामिया वक़्फ़ कमेटी का गठन और अधिकार,
बात वक़्फ़ नम्बर 87 की करें तो वक़्फ़ डीड के अनुसार मोतवल्ली के अलावा इसकी चार सदस्यों की इंतेजामिया वक़्फ़ कमेटी होगी।
सैयद जाहिद अली सब्ज़पोश इस वक़्फ़ के पहले मोतवल्ली नियुक्त किए गए उसके बाद सैयद काजिम अली को मौलवी साहब ने मोतवल्ली की जिम्मेदारी सौंपने और बाद में करीबी रिश्तेदार को मोतवल्ली पद पर वरीयता देने की बात वक़्फ़ डीड में कही गई ।
इसी प्रकार 4 सदस्यों की एक इंतजामिया वक़्फ़ कमेटी बनाई जिसका काम यतीमखाने की पूरी तरह देखभाल करने के अलावा मोतवल्ली के कामों पर नज़र रखना और साल में एक बार हिसाब किताब करना था।
किसी सदस्य का स्थान रिक्त होने पर नए सदस्य की नियुक्ति का प्रावधान भी मोतवल्ली की तरह डीड में दर्ज है। इस वक़्फ़ नंबर 87 की पहली इंतेजामिया वक़्फ़ कमेटी में काजी तलम्मुज़ हुसैन, काजी अजिमउल हक, मोहम्मद इब्राहिम व मुंशी अब्दुल मजीद शामिल थे।
यतीमखाने के साथ गायब हो गई इंतेजामिया वक़्फ़ कमेटी,
हज़ार एकड़ से ज़्यादा सम्पत्ति वाले इस वक़्फ़ की आमदनी का 50% हिस्सा यतीमखाने पर खर्च करने की बात वक़्फ़ डीड में दर्ज है।
लेकिन आज न तो यतीमखाना बचा और न ही कोई इंतेजामिया वक़्फ़ कमेटी ही वजूद में है। यानी करोड़ो रूपये की आमदनी वाले इस वक़्फ़ की सारी आमदनी मोतवल्ली की जेब में जा रही है।
वक़्फ़ डीड के विपरीत जाफरा बाज़ार यतीमखाने को बंद करके वहां अन्य धार्मिक गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है।
कहना गलत नही होगा कि गरीबों, बेसहारा, बेवाओं और यतीमों के लिए बनाए गए इस वक़्फ़ पर एक व्यक्ति का कब्ज़ा हो चुका है और हज़ारों एकड़ की सम्पत्ति वाला ये वक़्फ़ उनकी निजी मिल्कियत में लगभग शामिल हो गया है।
कहाँ कहाँ है यतीमखाने वाले वक़्फ़ की सम्पत्ति,

