ज्योतिषी एकता सनातन विश्व संस्थान (Global Astrospiritual Institute) के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी आत्मबोधानंद (डॉ अनिल मिश्रा) व राष्ट्रीय महासचिव डॉ पंकज त्रिपाठी जी संस्थान के विस्तार एवं उद्देश्य तथा कार्यों पर विमर्श के लिए 5 दिवसीय गोरखपुर प्रवास पर आए।

राष्ट्र के चारित्रिक नव-निर्माण, विश्वकल्याण एवं विश्वशांति के लिए बाबा गोरक्षनाथ धाम, गीता धाम, बुढ़िया देवी धाम, माता लेहड़ा देवी तथा गइया काली माता सिद्ध पीठ में जाकर प्रार्थना करने के उपरांत गोरक्ष परिक्षेत्र, दिल्ली परिक्षेत्र तथा हरियाणा परिक्षेत्र के पदाधिकारियों से संस्थान के विस्तार, उद्देश्य और कार्यक्रमों पर विमर्श किया।
उन्होंने मुहूर्तचिंतामणि तथा पियूषधारा को संदर्भित करते हुए कहा -चिकित्सिकज्योतिष मन्त्रवादा:, पदे-पदे प्रत्ययमावहन्ति… भावार्थ यह है कि चिकित्साशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र और मन्त्रशास्त्र, ए तीन शास्त्र पग-पग पर विश्वास दिलाने वाले हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को अपनी विरासत पर गर्व के साथ विकास के पथ पर अग्रसर होकर विश्व स्तर पर आध्यात्मिक मार्गदर्शन का कार्य विश्व कल्याण और विश्व शांति के लिए करना है। उन्होंने बताया कि महाप्रभु स्वामी रामनाथ धाम में निरंतर “दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ जग संकट भारी” मन्त्र का जप होता रहता है।
उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जग शिवत्व से भर दे’ से इन पंक्तियों- “प्रश्न है उत्थान का केवल नही अब, प्रश्न है अब लोभ के भी संवरण का, प्राण जब निष्प्राण में भरने लगे हम, प्रश्न है निःश्वास होते आचरण का” को संदर्भित करते हुए कहा कि आज के समय की माँग आचरण का शुद्धिकरण है।
नक्षत्रों एवं ग्रहों के गति संयोग से तीर्थराज प्रयाग में 144 वर्षों के बाद पड़ा यह पवित्र महाकुम्भ लोक आचरण की शुद्धि करे, यही सभी संतों का अभिष्ट होना चाहिए।
महाकुम्भ की उत्तम व्यवस्था के लिए उन्होंने राज्य सरकार और केंद्र सरकार को साधुवाद कहा। उन्होंने कहा कि बाबा गोरक्षनाथ की परंपरा को पोषित करने वाली महान गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर माननीय योगी आदित्यनाथ जी का इस समय राज्य के मुख्यमंत्री के आसन पर विराजमान होना भी सुखद संयोग ही है।
उन्होंने कहा कि मात्र होरा ही ज्योतिष नहीं है, कालपुरुष के सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्पंदन को भी देख लेने वाला ज्योतिषशास्त्र तो छः वेदांगों ( शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष) में वेद का नेत्र है।
उन्होंने कहा कि जब विश्व में सभ्यताएं विकसिक हो रही थीं, उसके हज़ारों-हज़ार साल पहले वैदिक अनिष्ठानों के लिए शुभ-मुहूर्त के निर्धारण का कार्य भारतीय ऋषियों (ज्योतिष दृष्टाओं) ने कर दिया था।
उसी परंपरा में मध्यकालीन महान ज्योतिषाचार्य गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरित मानस में लिखते हैं- “माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥ देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥”
हमें आचरण की शुद्धि के साथ श्रेष्ठ सनातन ज्ञान परंपरा को जन-जन के सहयोग के साथ आगे बढ़ाते हुए भारत को पुनः विश्वगुरु के गरिमामय पवित्र आसन पर प्रतिष्ठित करना है, जिसमें ज्योतिषियों और आध्यात्मिक गुरुओं के आशीर्वाद और उनके मार्गदर्शन की आवश्यकता है, क्योंकि ज्योतिषाचार्यो के लिए विष्णुधर्मोत्तर पुराण के पितामह सिद्धान्त में कहा गया है कि- यो ज्योतिष वेद, स वेद सर्वम् अर्थात् जो ज्योतिष को जानता है, वह सब कुछ जानता है।
इस प्रकार ज्योतिष को जानना ज्ञान और साधना के उच्चतम स्तर तक पहुँचना है। अष्टांग योग सिद्धि है। एक सिद्ध योगी ही वाग्सिद्ध ज्योतिषी हो सकता है। वह मन के कारक चंद्र की स्थिरता का ज्योतिषीय उपाय करके मन को स्थिर कर चित्त की वृत्तियों का सहज निरोध करने की विधि जानता है।
वैश्विक ज्योतिष ज्ञान के सार को ग्रहण कर उन्हें एकीकृत करते हुए ज्योतिष के मानकीकरण पर शोध और ज्योतिष जगत् के लिए अचार संहिता के निर्माण और उसके कार्यान्यवन का कार्य भी ज्योतिषी एकता सनातन विश्व संस्थान, वैश्विव स्तर पर अनुभवी आध्यात्मिक गुरुओं और श्रेष्ठ संस्कारी ज्योतिषविदों के मार्गदर्शन में करेगा।
उन्होंने कहा कि संस्थान का ध्येय वाक्य-“जीवने यावदादानं स्यात् प्रदानं यत् ततोSधिकम्” अर्थात् जीवन में प्रकृति से समाज से, परिवार से, गुरु से जो कुछ लिया उससे अधिक उन्हें देने की चाह सदैव बनी रहे।
ज्ञातव्य है कि चिकित्साशास्त्र, मन्त्रशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र के साधक डॉ अनिल मिश्र, किंग जार्ज मेडिकल कालेज, लखनऊ विश्वविद्यालय के डबल गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा डॉ मिश्र को उच्च अध्ययन हेतु दो बार फेलोशिप प्रदान की गई हैं, जिसमें वह दक्षिण पूर्व एशिया देशों के फेलोज के ग्रुप लीडर भी रहे हैं। वह विश्व स्वास्थ्य संगठन में सलाहकार के पद पर कार्य कर चुके हैं।
हिंदी, संस्कृति, अंग्रेजी, भोजपुरी और अवधी के जानकार डॉ अनिल मिश्र (स्वामी आत्मबोधानन्द) जी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित, प्रसारित और सम्मानित लेखक, कवि और शोध अध्येता हैं। अपकी कई पुस्तकें और शोधपत्र प्रकाशित हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘डॉ अनिल मिश्र की साहित्य साधना’ विषय पर तथा वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय में डॉ मिश्र के साहित्यिक योगदान पर शोध भी हो चुका है।
महाप्रभु स्वामी रामनाथ की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े डॉ मिश्र को ‘स्वामी आत्मबोधानंद’ नाम उनके शिष्य प्रातः स्मरणीय श्री मौनी स्वामी जी ने दिया था।
स्वामी आत्मबोधानन्द जी उनकी ही प्रेरणा से वर्षों से फलाहार पर हैं।
सभी के लिए स्वस्ति कामना के साथ वह अपनी बात पूर्ण करते हैं- “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भागभवेत।”
संस्थान के राष्ट्रीय महासचिव/सीईओ ज्योतिषशास्त्र में पीएच डी प्रख्यात ज्योतिषी डॉ पंकज त्रिपाठी ने कहा की जैसा कि संस्थान के अध्यक्ष जी द्वारा बतलाया गया भारतीय सनातन ज्ञान परंपरा को पोषित करते हुए, ज्योतिषी एकता के साथ हम जन-जन के सहयोग से इस कार्य को आगे बढ़ाएंगे, हम इसके लिए कृत संकल्प हैं।

