गोरखनाथ मंदिर। संगोष्ठी । मंदिरयुगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 55 वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 10 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक संगोष्ठी के दूसरे दिन ” विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर बढ़ता भारत” विषय पर जे एन यू नई दिल्ली के अर्थशास्त्र विभाग (सेवानिवृत्त) ने कहा कि भारत सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर नहीं बढ़ रहा है अपितु भारत पुनः विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है । आज से 200 वर्ष पहले तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहते हुए विश्व में अपना योगदान दे रहा था। उसी स्थिति को पुनः प्राप्त करना भारत का लक्ष्य है। इस स्थिति में गिरावट का कारण औद्योगिक क्रांति रही है। इसके चलते बाहरी देशों ने यहां की संपदा व प्रतिभा को अपना बनाकर अपना विकास किया और यह देश गरीब होता चला गया । आजादी के बाद भारत के पुनर्निर्माण के लिए विश्वेश्वरैया के नेतृत्व में बनी समिति ने यह रिपोर्ट दी कि भारत को अपने वेल्थ को दो गुना करने की जरूरत है। इसके चलते गरीबी हटाओ का नारा भी दिया गया। यह विकास क्रम धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा लेकिन जब से भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी तथा उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी जी बने हैं तबसे देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से उछाल आया ,जिसके फलस्वरुप यहां के लोगों का अधिक मात्रा में रोजगार भी बढ़ा है। आज हम जिन देशों से नजर नहीं मिला पाते थे,उनके सामने सीना तान कर खड़े हो पा रहे हैं, इसका श्रेय पिछले 20 वर्षों की सरकारों के प्रयास को जाता है। आज भारत से गरीबी प्रायः समाप्ति के कगार पर है। वर्तमान सरकार देश में बिजली, पानी ,सड़क को घर-घर तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है जो विकसित देश बनने की महत्वपूर्ण कड़ी है।
उन्होंने कहा कि किसी भी देश के विकास में वहां की प्रतिभा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान होता है। हम अगर देखें कि जो भी विकसित देश है वहां जो भी प्रतिभाशाली डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक है वो अधिकतर भारत के हैं। आज भी हमारे प्रौद्योगिकी संस्थाओं की प्रतिभाओं का पलायन उसी तरह जारी है परंतु यह शुभ संकेत है कि अपने देश के विकास के लिए प्रतिभाओं को रोकने का प्रयास सरकार कर रही है। उनको अपने देश में उचित सम्मान देकर उनका सदुपयोग किया जा रहा है।
गुरुधाम वाराणसी से पधारे श्रीमद् जगद्गुरु अनंतानन्द द्वाराचार्य काशीपीठाधीश्वर स्वामी डॉ रामकमल दास वेदांती जी महाराज ने कहा कि हमारे देश के आध्यात्मिक केंद्र न केवल अध्यात्म की दिशा में ही कार्य करते हैं अपितु देश की अर्थव्यवस्था में भी विभिन्न प्रकार से अपना योगदान देते है, इसका सुंदर उदाहरण यह गोरक्षपीठ है। हमारी भारतीय संस्कृति में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए तिनके तिनके को बचाकर अर्थ की चिंता करने की बात की गई है। हमें अपने राष्ट्र में निर्मित वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। आज चीन हमसे आगे है क्योंकि वह हमारे सभी धार्मिक व सांस्कृतिक वस्तुओं का निर्माण करता है और हम उसको शौक से प्रयोग करते हैं।
नासिक महाराष्ट्र से पधारे योगी विलासनाथ जी महाराज ने कहा कि नाथ संप्रदाय की आधारशिला गुरु शिष्य परंपरा है इसमें गुरु को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। इस पन्थ में मानस जाता है कि गुरु गोरक्षनाथ संसार के कण कण में गुरुत्व के रूप में व्याप्त हैं। आदिनाथ भगवान् शिव हमेशा से विश्व गुरु रहे हैं इसके कारण भारत देश हमेशा से ही विश्व गुरु रहा है।
कटक उड़ीसा से पधारे महंत शिवनाथ जी महाराज ने कहा कि श्री गोरक्षपीठ नाथ संप्रदाय की पीठ है। यह परंपरा भगवान शिव से प्रारंभ होकर गुरु गोरक्षनाथ से प्रवर्तित होकर वर्तमान में भी जगत् कल्याण के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है । इस परंपरा के सिद्ध योगी हमेशा देश के सर्वविध विकास के लिए प्रयास करते रहे हैं। गुरु गोरखनाथ जी पूर्व के अखंड भारत में सर्वत्र भ्रमण करके देश को एक सूत्र में बांधने के लिए नाथ पंथ के छोटे-बड़े पीठों की स्थापना करके देश के विकास में अपना योगदान दिया। अनेक राजा महाराजा इस पंथ में दीक्षित होकर अपने राज्य को सही दिशा देने का कार्य किए हैं। आज भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार हो रही है निश्चित रूप से आनेवाले दिनों में भारत तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनेगी।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के रक्षा अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो हर्ष कुमार सिन्हा ने स्वागत एवं विषय प्रवर्तन में कहा कि आज हम जिन दोनों महापुरुषों की पुण्य स्मृति में यह कार्यक्रम कर रहे हैं। उन लोगों ने आजादी के बाद से निरंतर विभिन्न उपक्रमों के माध्यम से पूर्वांचल में विकास के कार्य किये। इस पीठ की गुरु शिष्य परंपरा की तीन पीढियां का अनुभव वर्तमान में हम कर रहे हैं। किसी भी देश के विकास में। शिक्षा एक महत्वपूर्ण पक्ष है । इसके दृष्टिगत 1932 में महंत दिग्विजयनाथ जी ने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् की स्थापना की। यह परंपरा उनके शिष्य महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने आगे बढ़ाया और आज उनके शिष्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में देश के विकास की प्रमुख कड़ी बनकर निरंतर प्रयासरत हैं। अर्थव्यवस्था किसी भी देश की आर्थिक दिशा व दशा का निर्धारण करती है। पिछले कुछ वर्षों से भारत की अर्थव्यवस्था सुधरी है , जिसके कारण आज दुनिया में भारत की सुनी जा रही है। पहले वह देश शक्तिशाली होता था जिसके पास सेनाएं व युद्ध उपकरण अधिक होते थे, किंतु आज वह देश शक्तिशाली है जिसकी अर्थव्यवस्था मजबूत है। इसी कारण से पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर भारत विश्व में मजबूती से खड़ा है और आगे भी प्रधानमंत्री जी के प्रयासों से अगले तीन वर्षों में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ अग्रसर है। तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर भारत न केवल विश्व में मजबूती से प्रस्तुत होगा बल्कि प्रत्येक भारतीय की आय दर में भी वृद्धि होगी। इस दिशा में विचार करने पर हमें अपने बीच में एक चक्रवर्ती उदाहरण के रूप में हमारे मुख्यमंत्री पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज मिलते हैं, जो अपने कार्यकाल में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को चरमोत्कर्ष पर ले जा रहे है। हमें यह भी विचार करना है कि हम आर्थिक रूप से मजबूत होकर उत्पाद बढ़ावे किंतु सामान्यजन के रोजगार पर भी ध्यान दें क्योंकि हमारा दृष्टिकोण ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ का रहा है। हमारा विकास ऐसा हो कि वो सबको साथ लेकर चले, तभी वास्तव में विकसित भारत की संकल्पना सिद्ध होगी।
अध्यक्षता गोरक्षपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ जी महाराज, आभार ज्ञापन महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के सदस्य डॉ रामजन्म सिंह, वैदिक मंगलाचरण डॉ रंगनाथ त्रिपाठी, गोरक्षाष्टक पाठ आदित्य पाण्डेय व गौरव तिवारी तथा संचालन माधवेंद्र राज ने किया।
इस अवसर पर सुग्रीव किला अयोध्या से स्वामी विश्वेष प्रपन्नाचार्य जी महाराज , सवाई आगरा से ब्रह्मचारी दासलाल जी महाराज , रावत मंदिर अयोध्या धाम से महंत राममिलन दास जी, सतुआबाबा आश्रम काशी से महंत संतोषदास जी महाराज, देवीपाटन शक्तिपीठ तुलसीपुर से महंत मिथिलेशनाथ जी महाराज, महंत रवींद्रदास , काशी से योगी रामनाथ , गोरक्षपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ जी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
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