नेशनल डेस्क निष्पक्ष टुडे :-
सोमवार को CJI की अध्यक्षता वाली बेंच कुलदीप सिंह सेंगर को सज़ा निलंबित करने के खिलाफ CBI की अपील पर सुनवाई करेगी–CBI ने याचिका में कहा है कि हाई कोर्ट का निष्कर्ष ग़लत है कि एक विधायक पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 5 के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की कैटेगरी में नहीं आता।
बच्चो के यौन शोषण के मामले में संरक्षण देने वाले पॉक्सो एक्ट जैसे अहम क़ानून के मर्म को समझने में दिल्ली HC ने भूल की। कोर्ट ने इस कानून के मकसद और भावना को ध्यान में नहीं रखा। POCSO एक्ट के सेक्शन 5(सी) को ठीक से और समग्र रूप से देखा जाए तो यह बात साफ हो जाती है कि इसमे पब्लिक सर्वेट का मतलब हर उस शख्श से है, जो अपनी शक्ति, पद, अधिकार या हैसियत (चाहे वह राजनीतिक हो या किसी और तरह की)उसका गलत इस्तेमाल करते हैं।
विधायक (अपराध के वक्त कुलदीप सेंगर का पद) भी संवैधानिक है। इस पद के साथ जहां शक्ति हासिल है, वही जनता का विश्वास भी जुड़ा है। समाज और राज्य के प्रति इस पद की अपनी जिम्मेदारी होती है। ऐसे में POCSO एक्ट के तहत सेंगर को ‘पब्लिक सर्वेट’ न मानना ग़लत है। CBI ने कहा है कि यदि सेंगर को रिहा किया जाता है तो यह पीड़ित की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा होगा। सेंगर बेहद प्रभावशाली व्यक्ति है, जिसके पास धन और बाहुबल है।
ज़मानत मिलने की सूरत में वह अब भी पीड़ित और उसके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता। बच्चों के साथ यौन शोषण जैसे गम्भीर अपराध में सिर्फ जेल में लंबा वक़्त गुजराने के चलते कोई ज़मानत का हक़दार नहीं हो जाता। उम्रकैद की सज़ा पाए शख्श की सज़ा निलंबित करने का फैसला तभी दिया जा सकता है , जब कोर्ट पहली नज़र में इस तथ्य को लेकर सन्तुष्ट हो कि आरोपी का उस केस में दोष ही नहीं बनता। कोर्ट ने कुलदीप सेंगर के आपराधिक इतिहास और इस फैसले के चलते लोगों के न्यायिक व्यवस्था में भरोसे पर पड़ने वाले असर को नज़रंदाज़ किए।

