ब्यूरो प्रभारी- संतोष कुमार त्रिपाठी खजनी गोरखपुर खजनी। गोरखपुर विष्णु भगवान के छठें अवतार, ब्राह्मण शिरोमणि भगवान परशुराम जी का हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के साथ परशुराम जन्मोत्सव मनाया जाता है, जो इस साल 30 अप्रैल को मनाई जाएगी। भगवान परशुराम विष्णु भगवान के छठे अवतार […]
ब्यूरो प्रभारी- संतोष कुमार त्रिपाठी खजनी गोरखपुर
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खजनी। गोरखपुर विष्णु भगवान के छठें अवतार, ब्राह्मण शिरोमणि भगवान परशुराम जी का हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के साथ परशुराम जन्मोत्सव मनाया जाता है, जो इस साल 30 अप्रैल को मनाई जाएगी। भगवान परशुराम विष्णु भगवान के छठे अवतार ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पुत्र थे, जो की चिरंजीवी है ।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि भगवान परशुराम महेंद्र पर्वत पर निवास करते हैं। वर्तमान में महेंद्र पर्वत उड़ीसा के गजपति जिले के परालाखेमुंडी में मौजूद है। भगवान परशुराम को अष्ट चिरंजीवियों में से एक मानते हैं। भगवान परशुराम का फरसा झारखंड के गुमला जिले में टांगीनाथ धाम में गड़ा हुआ है। यह स्थान राजधानी रांची से लगभग 150 किलोमीटर दूर है। मान्यता है कि इस धाम के एक मंदिर में परशुराम का फरसा मौजूद है, जो खुले आसमान के नीचे है। लेकिन उस पर आज तक जंग नहीं लगी है और यह भी मानते हैं कि परशुराम कलयुग में धरती पर मौजूद है । पुराणों में भगवान परशुराम को विष्णु के दसवे अवतार कल्कि को शस्त्र विद्या प्रदान करने वाले गुरु के रूप में बताया गया है।
परशुराम जी का नाम राम था लेकिन भगवान शिव द्वारा परशु नामक अस्त्र मिलने के बाद उन्हें भगवान शिव ने ही परशुराम नाम दिया। वे भगवान शिव के शिष्य थे और महाभारत काल के वीर योद्धाओं भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण को अस्त्र-शास्त्रों की शिक्षा देने वाले गुरु, शास्त्र एवं शस्त्र के धनी भगवान परशुराम है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार परशुराम भृगु वंश में जन्मे थे परशुराम जी को शास्त्रों की शिक्षा दादा ऋतिक पिता जमदग्नि तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा अपने पिता के मामा राजर्षि विश्वामित्र और भगवान शंकर से प्राप्त की थी ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में वे पारंगत थे। परशुराम जी के धनुष का नाम पिनाक था , यह धनुष भगवान शिव का ही था । सतयुग में जब एक बार गणेश जी ने परशुराम जी को शिव दर्शन से रोक लिया तो रुष्ट परशुराम ने उन पर परसों प्रहार कर दिया जिससे गणेश जी का एक दांत नष्ट हो गया और वह एक दंत कहलाए। त्रेता युग में जिसे परशुराम जी ने राजा जनक को दिया था जिसे भगवान राम ने सीता स्वयंवर में इस धनुष को तोड़ा था।
द्वापर युग में उन्होंने ही असत्य वाचन करने के दंड स्वरूप कर्ण को सारी विद्या विस्मृति हो जाने का श्राप दिया था ।
उन्हें महान योद्धा के रूप में जाना जाता है वह अपने क्रोध और न्याय के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि पिता के शरीर पर 21 घाव एवं अपनी माता को पति वियोग में सती हुआ देखकर भगवान परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वह इस वंश का सर्वनाश करेंगे और परशुराम जी ने सहस्त्रार्जुन राजा और इसके पुत्र और पोत्रों का वध किया था उन्होंने 21 बार क्षत्रियों का संहार किया। उन्होंने क्षत्रियों के अत्याचार और दुर्व्यवहार के खिलाफ युद्ध किया और उन्हें नष्ट कर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि वे धर्म और न्याय के लिए खतरा थे।
भगवान परशुराम ने धर्म और न्याय की स्थापना के लिए जीवन भर संघर्ष किया। न्याय के पक्षधर होने के कारण भगवान परशुराम जी बाल अवस्था से ही अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे।
उन्होंने दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की निरंतर सहायता एवम् रक्षा की है इसलिए लोग इन्हें कल्याणकारी भगवान के रुप में भी जाना जाता है।उन्होंने 21 बार इस पृथ्वी का परिक्रमण किया, जिसमें 108 शक्तिपीठ एवं तीर्थों की स्थापना भी की।