मानव की आरोग्यता के लिए आयुर्वेद और योग वरदान : लेविन, महायोगी गोरखनाथ विवि में आयुर्वेद, योग और नाथपंथ पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ, आयुर्वेद और योग के प्रसार व विस्तार में नाथ पंथ की अग्रणी भूमिका : लेविन, अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के वैज्ञानिक सत्रों में हुई योग और आयुर्वेद के विविध आयामों पर […]
मानव की आरोग्यता के लिए आयुर्वेद और योग वरदान : लेविन,
महायोगी गोरखनाथ विवि में आयुर्वेद, योग और नाथपंथ पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ,
आयुर्वेद और योग के प्रसार व विस्तार में नाथ पंथ की अग्रणी भूमिका : लेविन,
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के वैज्ञानिक सत्रों में हुई योग और आयुर्वेद के विविध आयामों पर चर्चा,
गोरखपुर, 12 जनवरी। महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, आरोग्यधाम के गुरु गोरक्षनाथ इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आयुर्वेद कॉलेज) की तरफ से आयुर्वेद, योग और नाथपंथ के पारस्परिक अंतरसंबंधों को समझने के लिए आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ रविवार को हुआ। इस अवसर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित इजराइल के आयुर्वेद औषधि विशेषज्ञ एवं आयुर्वेद प्रगति संस्था के निदेशक वैद्य गुई लेविन ने कहा कि मानव की आरोग्यता के लिए आयुर्वेद और योग वरदान हैं और नाथपंथ इन दोनों के प्रसार और विस्तार में सतत अग्रणी भूमिका का निर्वहन करता रहा है।
पंचकर्म और काय चिकित्सा के विशेषज्ञ वैद्य लेविन ने मानवता की स्वास्थ्य रक्षा के लिए आयुर्वेद, योग और नाथपंथ की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि आयुर्वेद न केवल अत्यंत प्राचीन बल्कि पूरी तरह हानिरहित चिकित्सा पद्धति है। प्राचीनकाल में यह जीवनशैली का हिस्सा था, बीच के कालखंड में कुछ विस्मृत करने की कोशिश हुई लेकिन वैश्विक महामारी कोरोना के आने के बाद पूरी दुनिया ने दोबारा इसके महत्व को अंगीकार किया है। उन्होंने योग की चर्चा करते हुए कहा कि यह मानव को निरोग रखने का पूर्णतः निशुल्क उपहार है। यदि कोई भी व्यक्ति योग करते हुए आयुर्वेद सम्मत जीवन अपनाए तो उसे किसी व्याधि होने की आशंका न्यूनतम हो जाती है। श्री लेविन ने कहा कि नाथपंथ से जुड़े योगियों और सिद्धों ने योग और आयुर्वेद को हमेशा ही न केवल स्वयं अपनाया बल्कि आमजन को भी इसके लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि गोरखनाथ की भूमि दिव्यता में येरुशलम जैसा प्रतीत होता है। यहां आयुर्वेद के लोग अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी कर रहे हैं इसका दिव्यता अद्भुत है। अपनी वृत्ति को छोड़कर भारत में आकर योग और अध्यात्म को सीखकर मेरा जन्म धन्य हुआ। उसी का प्रचार प्रसार इजरायल मैं कर रहा हूं।
विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित प्रोविंशियल आयुर्वेद हास्पिटल श्रीलंका की पूर्व निदेशक डॉ. अनुला इल्लु कुम्बरी ने कहा कि प्राचीन सांस्कृतिक और आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को लेकर श्रीलंका और भारत दोनों देशों की अपनी साझा विरासत है। दूसरे विशिष्ट अतिथि श्रीलंका से आए वनौषधि वाचस्पति डॉ.. मायाराम उनियाल ने कहा कि वैद्य शब्द गुरु गोरखनाथ ने दिया है। नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक भगवान शिव ही पारद ज्ञान के ज्ञाता हैं। वे रसशास्त्र के ज्ञाता और ज्ञान प्रदाता हैं। इस अवसर पर उन्होंने अपनी दो पुस्तकों को महायोगी गुरु गोरक्षनाथ विश्वविद्यालय, गोरखपुर के कुलपति डॉ. सुरिंदर सिंह को भेंट की।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के सलाहकार एवं भारत सरकार के पूर्व औषधि महानियंत्रक डॉ. जीएन सिंह ने कहा कि नाथपंथ ने योग और आयुर्वेद को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आयुर्वेद, योग और नाथपंथ को समाहित करते हुए आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी मानव जीवन की आरोग्यता में मिल का पत्थर साबित होगी। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, योग और नाथपंथ की आपस में एक साझा विरासत है। इस विरासत को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सपना इस महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय में साकार होता दिख रहा है।
इस अवसर पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के रसायनशास्त्र और भैषज्य कल्पना विभाग के वरिष्ठ आचार्य डॉ. के. राम चंद्र रेड्डी ने सम्मेलन के विषय और इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा की और आयुर्वेद के महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ धन्वंतरि वंदना, सरस्वती वंदना और कुलगीत से हुआ। अतिथियों के सम्मान के बाद स्वागत संबोधन आयुर्वेद कॉलेज के प्राचार्य डॉ. गिरिधर वेदांतम ने किया। इस अंताराष्ट्रीय संगोष्ठी में चार सौ अधिक प्रतिनिधियों की सहभागिता है। संगोष्ठी के पहले दिन उद्घाटन सत्र में कुलपति डॉ. सुरिंदर सिंह, कुलसचिव डॉ प्रदीप राव, आयुर्वेद कालेज के डॉ नवीन, डॉ दीपू मनोहर, डॉ विनम्र शर्मा, डॉ साध्वी नन्दन पाण्डेय, डॉ देवी और डॉ प्रिया और विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही ।