पिता जो अपनी मर्जी से दे वह दान है, दहेज न मांगें: राजनजी, ब्यूरो प्रभारी —-विनय तिवारी बडहगंज/गोरखपुर(निष्पक्ष टुडे) बड़हलगंज स्थानीय नेशनल इण्टर कालेज के खेल मैदान पर श्री हनुमान सेवा समिति चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा आयोजित श्रीराम कथा यज्ञ के छठवें दिन कथावाचक परम् पूज्य स्वामी राजन जी महाराज ने भगवान राम का सीता जी […]
पिता जो अपनी मर्जी से दे वह दान है, दहेज न मांगें: राजनजी,
ब्यूरो प्रभारी —-विनय तिवारी
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बडहगंज/गोरखपुर(निष्पक्ष टुडे) बड़हलगंज स्थानीय नेशनल इण्टर कालेज के खेल मैदान पर श्री हनुमान सेवा समिति चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा आयोजित श्रीराम कथा यज्ञ के छठवें दिन कथावाचक परम् पूज्य स्वामी राजन जी महाराज ने भगवान राम का सीता जी व लखन जी के साथ वन गमन , केवट राज की भक्ति और भगवान के प्रयागराज तक पहुंचने तक के प्रसंग को सुनाया । आज पूज्यवर ने केवट की भक्ति की खूबसूरती को प्रमुखता से सुनाकर उपस्थित भक्तों को भावविभोर कर सियाराममय कर दिया। ___राम कथा के छठवें दिन हजारों की तादात में जुटे श्रद्धालुओं पर राम रस की बौछार करते हुए पूज्य राजन जी ने मंगलवार को कहा कि शादी के बाद बारात जनवासे में रुकती है। शुभ मुहूर्त से पन्द्रह दिन पहुंची बारात विवाह के बाद भी बहुत दिनों तक रुकी रही। ऐसा लगता था कि विदेह जनक के प्रेम ने उन्हें बांध लिया ही। इसी तरह दिन बीतने के बाद आखिरकार बिदाई होती है।बेटी सीता की बिदाई के समय गले लगती हैं।विदेह जनक भी रो पड़ते हैं। हजारों हाथी,घोड़े, स्वर्ण पात्रों में भरी मणियां, अगणित गऊएं यानी कह सकते हैं कि कुबेर से भी अधिक धन सम्पदा देकर बेटी को विदा किया। महाराज दशरथ ने भी अपनी ओर से लोगों में काफी उपहार बांटे।यहां राजनजी ने लोगों से कहा कि दहेज को दान समझा जाय। बेटी का पिता जो अपनी मर्जी से दे वह स्वीकार करें। मांगें न। मांगना दहेज है। मांगना गलत है।बारात को कुछ दूर तक बिदा करने स्वयं राजा जनक जी आते हैं और राजा दशरथ से सत्कार में अगर कोई चूक हुई हो तो उसके लिये माफी मांगते हैं और कहते हैं, महाराज आपने हमारी चारो पुत्रियों को अपनी बहू के रूप में स्वीकार करके हमारा बड़ा ही सम्मान बढ़ाया है।वहीं दशरथ जी कहते हैं कि महाराज जनक जी आभारी तो मैं आपका हूं कि मैं एक बहू लेने आया था आपकी कृपा से चार चार ले जा रहा हूं।चारो बहुओं के साथ बारात उल्लास के साथ अयोध्या वापस आ जाती है।ऋषि विश्वामित्र बिदा लेकर जब चलने लगते हैं तो महाराज दशरथ उनके चरणों मे गिरकर कहते हैं “नाथ सकल संपदा तुम्हारी” जो राजा दशरथ कभी विश्वामित्र जी को राम चन्द्र जी को देने से मना कर दिये थे वो आज कह रहे नाथ,यह धन- दौलत, पुत्र,पत्नी, सकल परिवार जो भी है वह आपका है।कृपा करके बच्चों पर दया करने के लिये दर्शन देते रहिएगा। जब से श्री रामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तब से अयोध्या में नित्य नए मंगल हो रहे हैं और आनंद की बधाइयां बज रही हैं।
इधर एक दिन दशरथ जी दर्पण में अपने आप को देखा है। फिर मुकुट को सीधा किया है।
श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥ महाराज को अपने कानों के पास सफ़ेद बाल दिखाई दिया है। अब महाराज समझ गए की वैराग्य का समय हो गया है।क्यों ना अब रामजी को राजा बनाकर अपने जीवन और जन्म का लाभ लूं। अपने मन की बात गुरु वशिष्ठ जी को बताई।गुरुदेव कहते हैं कि तुम्हारी सोच बड़ी उत्तम है। दशरथ जी कहते हैं तो ठीक है आप मुहूर्त निकलवाएं।गुरुदेव कहते हैं मुहर्त निकलवाने की कोई जरुरत नहीं है। जिस समय रामजी राजसिंहासन पर बैठ जायेंगे उससे अनुकूल कोई मुहूर्त हो ही नहीं सकता।”सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।” रामचन्द्रजी के राज्याभिषेक की सुहावनी खबर सुनते ही अवध में धूम मच गई।गुरुदेव सीता-राम के पास गए। राम और सीता ने गुरुदेव के चरणों में शीश नवाया है फिर बोले,गुरुदेव , आपने हमें ही बुला लिया होता पर आप ने स्वयं यहाँ पधारकर जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया! हे गोसाईं! (अब) जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ।श्रीराम के युवराज पद देने की घोषणा से मंथरा के कहने पर महारानी कैकेई नाराज होकर कोप भवन में चली गयी।राजा ने यह बात सुनी तो तुरंत कोप भवन गये और कैकेई अपने दो वचन देने के लिये सौगंध ले ली।अब राजा दशरथ ने राम की सौगंध खा ली और बोल दिया कि जो मांगना है मांग लो। कैकेई ने मांगा कि मेरे पुत्र भरत का राजतिलक हो। साथ ही,”तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।” तपस्वियों के वेष में राम को 14 वर्ष का वनवास दिया जाय। राजा दशरथ ने बहुत समझाया लेकिन रानी नहीं मानी।विलाप करते-करते ही राजा को सबेरा हो गया।रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी ने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालत में पड़े हैं।रामजी ने आज अपने जीवन में पहली बार यह दुःख देखा, इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। फिर हृदय में धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनों से माता कैकेयी से पूछा-हे माता! मुझे पिताजी के दुःख का कारण कहो। उन्होंने बताया और कहा कि ये महाराज की आज्ञा और आदेश है।जब रामजी ने सुना तो उनकी मुस्कान वैसी ही बनी हुई हैं। मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू॥ श्रीरामचन्द्र ने पिता और कैकेयी को प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा की और कौशल्या के चरणों में मस्तक झुकाकर उन्हें सान्त्वना दी। फिर लक्ष्मण और पत्नी सीता को साथ ले सुमंत के साथ रथ पर बैठकर वे नगर से बाहर निकले। रात में तमसा नदी के तट पर निवास किया। उनके साथ बहुत-से पुरवासी भी गये थे। उन सबको सोते छोड़कर वे आगे बढ़ गए।वे रथ पर बैठे-बैठे श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ निषादराज गुह ने उनका पूजन, स्वागत-सत्कार किया। श्रीरघुनाथ ने इंगुदी-वृक्ष की जड़ के निकट विश्राम किया। लक्ष्मण और गुह दोनों रात भर जागकर पहरा देते रहे।
प्रात:काल श्रीराम ने रथ सहित सुमंत को विदा कर दिया तथा स्वयं लक्ष्मण और सीता के साथ नाव से गंगा जी के तट पर जाकर केवट राज को पार जाने के लिये अपनी नाव लाने को कहते हैं तब केवट राज कहता है,”मांगी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥ छुवत शिला भई नारि सुहाई, पाहन ते न काठ कठिनाई।।”
केवट कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म जान लिया। तुम्हारे चरण की धूल से पत्थर नारी बन जाता है। मैं इसी नाव से अपना परिवार पालते हैं।वह कहता है कि पहले आप अपना पांव धुलवाइए।मैं परख लूंगा फिर नाव पर चढ़ाऊंगा।”सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे,बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।:
प्रभु राम ने माता जानकी और लखन लाल की तरफ देख कर बोले अब तो फंस ही गया हूँ , चरण धुलवाने ही पड़ेंगे।भगवान ने कहा जो तुम्हारी इच्छा हो वह करो। केवट उनका चरण पखार सपरिवार चरणामृत का पान कर सभी को उस पार उतारा।पार उतरने के बाद भगवान श्रीराम उतराई देने लगते है तो केवट मना करते हुए कहता है कि प्रभु एक नाविक दूसरे से उतराई नहीं लेता है। आज मैंने आपको उतारा है कल आप मुझको भवसागर से पार उतार दीजिएगा।गंगा-पार कर भगवान प्रयागराज पहुंचे है । वहाँ उन्होंने महर्षि भारद्वाज को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वहाँ से चित्रकूट पर्वत को प्रस्थान किया।चित्रकूट पहुँच कर उन्होंने पर्णकुटी बना वास्तु पूजा कर मन्दाकिनी के तट पर निवास किया। रघुनाथ जी ने सीता को चित्रकूट पर्वत का रमणीय दृश्य दिखलाया।इसके पूर्व कथा के मुख्य यजमान डा एस.एन चौबे व शांति चौबे,सन्तोष कटियार व सीमा कटियार,युगल किशोर पाण्डेय व मंशा पाण्डेय,राजेश सिंह,पूनम सिंह,पूनम शाही ने व्यास पीठ का पूजन व आरती कर कथा प्रारम्भ कराई।इस अवसर पर अध्यक्ष सुबेदार राय, उपाध्यक्ष कुलदीप राय, अनिल कुमार पाण्डेय, संरक्षक डाक्टर ए ने चौबे, वरिष्ठ सदस्य कैलाश नाथ मिश्रा, राम हर्ष गुप्ता, कमलेश सिंह, राजीव राय, अजय प्रसाद राय, योगेश राय ,मुकेश राय, तारा राय, सरोज, सुष्मिता, कविता,अनिल पाण्डेय व प्रेम सागर तिवारी सहित भारी संख्या में श्रद्धालु श्रोता मौजूद रहे।