निष्पक्ष टुडे /SPECIAL REPORT
26,050 लाभार्थी… लाखों रुपये की सहायता… लेकिन सवाल—क्या सामाजिक एकीकरण के नाम पर सरकार विवाह के फैसलों को आर्थिक रूप से प्रभावित कर रही है?
नई दिल्ली/लखनऊ।भारत में SC/ST समुदाय के व्यक्ति का अन्य जाति के व्यक्ति से विवाह होने पर केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों की ओर से आर्थिक प्रोत्साहन की योजनाएं संचालित की जाती हैं।

सरकार का घोषित उद्देश्य है—जातिगत भेदभाव कम करना, सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देना और ऐसे विवाह करने वाले पात्र दंपतियों को आर्थिक सहायता देना।
लेकिन इस व्यवस्था के साथ कुछ महत्वपूर्ण सामाजिक और नीतिगत सवाल भी उठते हैं।
2024-25 में 26,050 लाभार्थी :-
केंद्र सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में इस योजना के तहत देशभर में 26,050 लाभार्थी दर्ज किए गए।
पिछले वर्षों के आंकड़े—
2020-21 — 20,237
2021-22 — 24,062
2022-23 — 14,225
2023-24 — 21,083
2024-25 — 26,050
ध्यान रखें –
ये भारत में हुए कुल SC/ST–अन्य जाति विवाहों की संख्या नहीं है।
यह केवल सरकारी योजना के तहत दर्ज लाभार्थियों की संख्या है।
महाराष्ट्र सबसे आगे –
2024-25 में सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार—
महाराष्ट्र — 8,566
कर्नाटक — 2,798
तमिलनाडु — 2,476
हरियाणा — 2,350
ओडिशा — 2,039
गुजरात — 1,775
मध्य प्रदेश — 1,646
पश्चिम बंगाल — 1,510
कुल मिलाकर देशभर में 26,050 लाभार्थी दर्ज हुए।
कितना मिलता है सरकारी मदद –

केंद्रीय व्यवस्था में पात्र SC–अन्य जाति विवाह के लिए ₹2.50 लाख तक के प्रोत्साहन का प्रावधान है।
योजना के दस्तावेज के अनुसार सहायता राशि दंपति के संयुक्त नाम से बैंक में रखने और तीन वर्ष की लॉक-इन अवधि का प्रावधान है।

हालांकि वास्तविक लाभ राज्य की पात्रता और प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर कर सकता है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल—सरकार विवाह पर पैसा क्यों देती है?
यहीं से इस योजना को लेकर बहस शुरू होती है।
अगर दो वयस्क अपनी इच्छा से विवाह करते हैं, तो—
क्या सरकार को उनके विवाह के आधार पर आर्थिक प्रोत्साहन देना चाहिए?
अगर सरकार का उद्देश्य जातिगत भेदभाव खत्म करना है, तो सवाल यह भी है—
क्या सभी जातियों के बीच विवाह को समान रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, या केवल कुछ विशेष सामाजिक संयोजनों को?
और सबसे अहम—
क्या आर्थिक प्रोत्साहन किसी व्यक्ति के विवाह संबंधी निर्णय को प्रभावित कर सकता है?
क्या इसे “सरकारी धर्मांतरण” कहा जा सकता है?
यह सवाल भी सार्वजनिक बहस में उठाया जा रहा है, लेकिन यहां तथ्य और आरोप को अलग रखना जरूरी है।
SC/ST–अन्य जाति विवाह को प्रोत्साहित करने वाली योजना स्वयं धर्म परिवर्तन की योजना नहीं है।

सरकारी योजना का घोषित आधार जाति और सामाजिक एकीकरण है, धर्म परिवर्तन नहीं पर एक ही जाति पर विशेष मेहरबानी क्यों ?
लेकिन आलोचनात्मक सवाल यह जरूर हो सकता है—
“जब सरकार किसी खास सामाजिक संयोजन वाले विवाह पर आर्थिक प्रोत्साहन देती है, तो क्या यह केवल सामाजिक भेदभाव कम करने की नीति है, या इससे विवाह के निजी निर्णयों पर आर्थिक प्रभाव पड़ने की संभावना भी पैदा होती है ?”
यही वह बिंदु है जिस पर नीति को लेकर सार्वजनिक बहस हो सकती है।
एक और बड़ा सवाल –
अगर उद्देश्य जातिगत भेदभाव खत्म करना है तो—
क्या सरकार को जाति की पहचान को विवाह के लिए आर्थिक लाभ की पात्रता का आधार बनाना चाहिए?
क्योंकि एक तरफ सरकार कहती है कि समाज को जाति से ऊपर उठना चाहिए।
दूसरी तरफ योजना में पात्रता निर्धारित करने के लिए जाति प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है।
सवाल यही है—
जाति-मुक्त समाज बनाने के लिए क्या जाति आधारित प्रोत्साहन जरूरी है? या
ऐसी योजनाओं से जाति की पहचान सरकारी रिकॉर्ड में और लंबे समय तक बनी रहती है?
यह नीति का एक महत्वपूर्ण विमर्श है।
दूसरी तरफ सरकार का तर्क क्या है?
सरकार की ओर से ऐसी योजनाओं का मूल तर्क यह है कि समाज में जातिगत भेदभाव और सामाजिक बाधाएं अभी भी मौजूद हैं।
इसलिए आर्थिक प्रोत्साहन को सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने वाले उपाय के रूप में देखा जाता है।

यानी सरकारी दृष्टिकोण में यह किसी धर्म को बदलने की योजना नहीं, बल्कि जातिगत विभाजन कम करने की सामाजिक नीति है।
लेकिन इस नीति का प्रभाव कितना है और क्या आर्थिक सहायता वास्तव में विवाह के निर्णयों को प्रभावित करती है—यह अलग प्रश्न है, जिसके लिए व्यापक सामाजिक अध्ययन और आंकड़ों की आवश्यकता होगी।
SC और ST को एक साथ समझना भी जरूरी नहीं ?
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि केंद्र की जिस प्रमुख योजना के ये 26,050 आंकड़े हैं, उसकी पात्रता मुख्यतः SC से संबंधित अंतरजातीय विवाह से जुड़ी है।
इसलिए—
SC + अन्य जाति
और
ST + अन्य जाति
को एक ही केंद्रीय आंकड़े में स्वतः जोड़ना उचित नहीं है।
ST विवाह के लिए संबंधित राज्य की जनजातीय कल्याण योजनाओं और नियमों को अलग से देखना होगा।
उत्तर प्रदेश: आंकड़ों का सवाल –
केंद्र की राज्यवार तालिका में उत्तर प्रदेश के लिए 2021-22 से 2024-25 तक 0 दर्ज है।
लेकिन बाद की केंद्रीय रिपोर्टिंग में यूपी के लाभार्थियों का उल्लेख मिलता है।
इसलिए सवाल उठता है—
क्या अलग-अलग वर्षों में योजना की reporting व्यवस्था बदली है?
क्या केंद्र और राज्य के आंकड़ों में तालमेल है?
और क्या आम लोगों को यह स्पष्ट जानकारी उपलब्ध है कि पात्र दंपति को वास्तव में कितना लाभ मिल सकता है?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों के आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगा।
निष्पक्ष टुडे के सवाल –
सवाल नंबर 1
अगर उद्देश्य जातिगत भेदभाव खत्म करना है, तो क्या आर्थिक प्रोत्साहन सही तरीका है?
सवाल नंबर 2
क्या विवाह के आधार पर सरकारी आर्थिक प्रोत्साहन देना व्यक्ति के निजी निर्णय को प्रभावित कर सकता है?
सवाल नंबर 3
जब सरकार जाति से ऊपर उठने की बात करती है, तो पात्रता के लिए जाति प्रमाणपत्र क्यों जरूरी है?

सवाल नंबर 4
क्या समान परिस्थितियों वाले सभी विवाहों के लिए समान आर्थिक प्रोत्साहन होना चाहिए?
सवाल नंबर 5
क्या इस योजना का वास्तविक सामाजिक प्रभाव मापने के लिए सरकार के पास कोई स्वतंत्र अध्ययन है?
सवाल नंबर 6
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या यह सिर्फ सामाजिक एकीकरण की सरकारी नीति है, या आर्थिक प्रोत्साहन के जरिए विवाह के सामाजिक स्वरूप को प्रभावित करने की कोशिश भी है?और “सरकारी धर्मांतरण” वाला सवाल?
उसका जवाब तथ्यों से ही मिल सकता है।
क्योंकि उपलब्ध सरकारी योजना के दस्तावेजों में इसका उद्देश्य धर्म परिवर्तन नहीं, बल्कि जातिगत भेदभाव कम करना और सामाजिक एकीकरण बताया गया है।
इसलिए निष्पक्ष सवाल यही होना चाहिए—
“सरकार की नीति का घोषित उद्देश्य क्या है, जमीन पर उसका वास्तविक प्रभाव क्या है, और क्या इस आर्थिक प्रोत्साहन की जरूरत तथा समानता पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए?”
अब सरकारी खर्च की –







