अनुराग त्रिपाठी ब्यूरो सिद्धार्थनगर :-
ऐचनी गांव में पूर्वजों की धरोहर को नई पीढ़ी ने दिया नया जीवन, जीर्णोद्धार के साथ रुद्राभिषेक, लघु महामृत्युंजय जाप और विशाल भंडारे का हुआ भव्य आयोजन
03 अगस्त 2026 | सोमवार | श्रावण मास विशेष,
ऐचनी /बांसी /सिद्धार्थनगर श्रावण मास के पावन अवसर पर सिद्धार्थनगर जनपद के ग्राम ऐचनी स्थित लगभग 166 वर्ष पुराने ऐतिहासिक पशुपतेश्वर महादेव मंदिर में ऐसा धार्मिक आयोजन हुआ, जिसने केवल एक मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं किया, बल्कि छह पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, संस्कार और पारिवारिक एकता की विरासत को नई ऊर्जा प्रदान की।
जहाँ से शुरू हुई एक अमर विरासत :-
इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण, प्रतिष्ठा एवं उद्घाटन संवत् 1917 (लगभग 1860 ईस्वी) में स्वर्गीय श्री पशुपतिनाथ त्रिपाठी ने कराया था। उनके पिता स्वर्गीय श्री शिवदत्त त्रिपाठी के पाँच पुत्र थे—
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स्वर्गीय श्री पशुपतिनाथ त्रिपाठी
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स्वर्गीय श्री तमेश्वर नाथ त्रिपाठी
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स्वर्गीय श्री निश्चय नाथ त्रिपाठी
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स्वर्गीय श्री रमेश्वर नाथ त्रिपाठी
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स्वर्गीय श्री परमेश्वर नाथ त्रिपाठी
इन्हीं में से स्वर्गीय श्री पशुपतिनाथ त्रिपाठी ने भगवान शिव के इस मंदिर की स्थापना कर एक ऐसी विरासत की नींव रखी, जो आज भी पूरे क्षेत्र की आस्था का केंद्र है।
छह पीढ़ियों का अटूट रिस्ता मंदिर से :-
स्वर्गीय श्री पशुपतिनाथ त्रिपाठी के पुत्र स्वर्गीय श्री बल्देव त्रिपाठी ने इस विरासत को आगे बढ़ाया।
इसके बाद परिवार की प्रत्येक पीढ़ी ने मंदिर से अपना संबंध बनाए रखा।
स्वर्गीय श्री महावीर त्रिपाठी, स्वर्गीय श्री रामउग्रह त्रिपाठी, स्वर्गीय श्री मोहरनाथ त्रिपाठी और स्वर्गीय श्री असरफीनाथ त्रिपाठी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

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स्वर्गीय श्री महावीर त्रिपाठी के पुत्र स्वर्गीय श्री रामलाल त्रिपाठी हुए, जिनके पुत्र श्री इंद्रजीत त्रिपाठी और श्री सभाजीत त्रिपाठी हैं।
स्वर्गीय श्री रामउग्रह त्रिपाठी की चार पुत्रियाँ थीं।
कौन थे स्व.पुजारी बाबा ..?
पुजारी बाबा’ के नाम से प्रसिद्ध थे स्वर्गीय श्री रामउग्रह त्रिपाठी
पशुपतेश्वर महादेव मंदिर के इतिहास में स्वर्गीय श्री रामउग्रह त्रिपाठी का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। वे भगवान भोलेनाथ के अनन्य उपासक एवं महान शिवभक्त थे। उनकी शिवभक्ति इतनी गहन थी कि आसपास के गांवों में लोग उन्हें स्नेह और आदर से “पुजारी बाबा” कहकर पुकारते थे।

उनका जीवन पूर्णतः भगवान शिव की आराधना, जप, तप, ध्यान और पूजा-पाठ को समर्पित था। सांसारिक विषयों, धन-संपत्ति और सामाजिक दिखावे से उनका कोई विशेष लगाव नहीं था।
उनका अधिकांश समय पशुपतेश्वर महादेव मंदिर में भगवान भोलेनाथ की सेवा और भक्ति में व्यतीत होता था। उनका सरल, सात्विक और तपस्वी जीवन आज भी परिवार एवं ग्रामवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

स्वर्गीय श्री रामउग्रह त्रिपाठी की चार पुत्रियाँ थीं। उनके कोई पुत्र नहीं थे। परिवार की इस जिम्मेदारी को उनके छोटे भाई स्वर्गीय श्री मोहरनाथ त्रिपाठी ने बड़े आत्मीय भाव से निभाया। स्वर्गीय श्री मोहरनाथ त्रिपाठी ने अपनी चारों भतीजियों का विवाह स्वयं कराकर परिवार की मर्यादा, कर्तव्यनिष्ठा और भाईचारे का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया। यह प्रसंग आज भी परिवार में सम्मान और गर्व के साथ स्मरण किया जाता है तथा दोनों भाइयों के त्याग, प्रेम और पारिवारिक एकता का प्रेरक प्रतीक माना जाता है।

स्वर्गीय श्री असरफीनाथ त्रिपाठी का विवाह के कुछ समय बाद ही असामयिक निधन हो गया था, जिससे उनकी कोई संतान नहीं हुई।
स्वर्गीय श्री मोहरनाथ त्रिपाठी के पुत्र स्वर्गीय श्री शिवप्रसाद त्रिपाठी एवं स्वर्गीय श्री शिव सहाय त्रिपाठी थे।

स्वर्गीय श्री शिवप्रसाद त्रिपाठी के पुत्र श्री शंभू प्रसाद त्रिपाठी, श्री जगदीश प्रसाद त्रिपाठी, श्री शत्रुधन प्रसाद त्रिपाठी एवं श्री सूर्यप्रकाश त्रिपाठी हैं।

जबकि स्वर्गीय श्री शिव सहाय त्रिपाठी के पुत्र श्री दामोदर प्रसाद त्रिपाठी एवं श्री बिश्वनाथ त्रिपाठी हैं।
जब पूर्वजों की धरोहर को मिला नया जीवन :-
लगभग 166 वर्ष बाद, श्रावण मास में इसी परिवार ने एक बार फिर इतिहास रचा। श्री शंभू प्रसाद त्रिपाठी एवं श्री जगदीश प्रसाद त्रिपाठी के नेतृत्व में पूरे परिवार ने मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया।
इस दौरान घड़ी घंट एवं बड़े घंटे की स्थापना, लघु महामृत्युंजय जाप, रुद्राभिषेक और वैदिक पूजा-अर्चना संपन्न हुई।

पूरा मंदिर परिसर “हर-हर महादेव” और “ॐ नमः शिवाय” के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
नई पीढ़ी बनी विरासत की नई पहचान
धार्मिक आयोजन को सफल बनाने में युवा पीढ़ी ने भी पूरे उत्साह से भागीदारी निभाई। श्री कृष्णमुरारी त्रिपाठी, श्री अनुराग त्रिपाठी, श्री करुड़ापति त्रिपाठी तथा श्री सरजू प्रसाद त्रिपाठी ने मंदिर की सजावट, श्रद्धालुओं के स्वागत, पूजा-अर्चना और भंडारे की व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभालकर यह संदेश दिया कि संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी उसे अपनाती है।
भंडारे में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब :-
धार्मिक अनुष्ठानों के समापन के बाद आयोजित विशाल भंडारे में ग्राम ऐचनी एवं आसपास के क्षेत्रों से आए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन में सेवा, सहयोग, भाईचारा और सामाजिक समरसता की अनुपम मिसाल देखने को मिली।
समाज के लिए प्रेरणा :-
पशुपतेश्वर महादेव मंदिर का यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि पूर्वजों की धरोहर केवल इतिहास नहीं होती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी भी होती है। जब परिवार अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के संरक्षण के लिए एकजुट होता है, तब वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।
मुख्य बातें :-






