झांसी/प्रयागराज ब्यूरो निष्पक्ष टुडे :-
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झांसी के मामलों की 3 महीने में जांच और पूरे उत्तर प्रदेश में राहत दावों की व्यवस्था की व्यापक समीक्षा के निर्देश दिए
SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के तहत मिलने वाली राहत राशि से जुड़े झांसी के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण जांच के निर्देश दिए हैं।

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि अधिवक्ता संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार के सदस्यों को विभिन्न आपराधिक मामलों में कुल ₹23,36,250 की राहत और वित्तीय सहायता मिल चुकी है, जबकि करीब 10 से 12 अन्य मामले राहत के दावों के साथ लंबित हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने झांसी में निष्पक्ष जांच और पूरे उत्तर प्रदेश में राहत दावों व वितरण की व्यवस्था की व्यापक समीक्षा के निर्देश दिए।
महत्वपूर्ण: अदालत ने संतोष कुमार दोहरे या उनके परिवार के किसी सदस्य को दोषी घोषित नहीं किया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बार-बार मामले दर्ज होना या राहत का दावा करना अपने-आप कानून के दुरुपयोग का प्रमाण नहीं है।
एक नजर में मामला :-
₹23,36,250 — राज्य सरकार के अनुसार विभिन्न मामलों में मिली कुल राहत/वित्तीय सहायता।
10 से 12 मामले — जिला स्तरीय समिति के समक्ष राहत दावों के साथ लंबित बताए गए।
3 महीने में जांच — झांसी के मामलों और राहत दावों की निष्पक्ष जांच का निर्देश।
पूरे यूपी में समीक्षा — बार-बार किए जाने वाले राहत दावों और सार्वजनिक धन के वितरण की व्यवस्था की जांच।
कोई दोष सिद्ध नहीं — जांच के बाद ही तथ्यों पर अंतिम निष्कर्ष निकल सकता है।
मामला आखिर शुरू कैसे हुआ?
मामला झांसी की SC/ST विशेष अदालत के दो आदेशों के खिलाफ दाखिल आपराधिक अपीलों से जुड़ा था।
अपीलकर्ताओं का कहना था कि SC/ST (Prevention of Atrocities) Rules, 1995 के तहत उन्हें निर्धारित राहत की पूरी राशि नहीं मिली।

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, जांच अधिकारी ने संबंधित मामलों में प्रत्येक पीड़ित के लिए ₹2 लाख राहत का प्रस्ताव भेजा था। प्रस्ताव के अनुसार राहत राशि चरणों में दी जानी थी—
राहत का प्रस्तावित ढांचा
25% — FIR दर्ज होने पर
50% — चार्जशीट दाखिल होने के बाद
25% — दोषसिद्धि के बाद
इस हिसाब से चार्जशीट के चरण तक प्रत्येक पात्र पीड़ित के लिए ₹1.50 लाख देय होने का तर्क रखा गया। राहत की शेष राशि को लेकर विवाद विशेष अदालत से होते हुए हाईकोर्ट पहुंचा।
₹23.36 लाख और 10-12 लंबित मामलों का मुद्दा क्यों उठा?
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत के सामने बताया कि संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार के सदस्यों को अलग-अलग आपराधिक मामलों के संबंध में कुल ₹23,36,250 की राहत और वित्तीय सहायता मिली है।
राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि करीब 10 से 12 अन्य मामले जिला स्तरीय समिति के समक्ष लंबित हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि राहत के दावों के इस पैटर्न की स्वतंत्र जांच जरूरी है। उद्देश्य यह पता लगाना है कि संबंधित मामलों में राहत और अन्य लाभ नियमों के अनुसार दिए या मांगे गए या नहीं।
हाईकोर्ट ने झांसी में क्या जांच करने को कहा?
हाईकोर्ट ने झांसी के जिलाधिकारी को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के साथ समन्वय कर जांच कराने का निर्देश दिया है।
जांच में मुख्य रूप से देखा जाएगा—
1. आपराधिक मामलों की पृष्ठभूमि
संबंधित मामले किन परिस्थितियों में दर्ज हुए?
2. राहत का पूरा रिकॉर्ड
किन मामलों में कितनी राशि दी गई और किस आधार पर दी गई?
3. लंबित दावे
10 से 12 लंबित मामलों में राहत के दावों की स्थिति और आधार क्या है?
4. सत्यापन प्रक्रिया
सार्वजनिक धन जारी करने से पहले आवश्यक जांच और सत्यापन किया गया या नहीं?
5. संभावित दुरुपयोग
क्या SC/ST Act और उसके तहत बने नियमों की कल्याणकारी व्यवस्था का कहीं अनुचित उपयोग हुआ?
हाईकोर्ट ने इस जांच को तीन महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है।
पूरे उत्तर प्रदेश के लिए भी बड़ा सवाल
हाईकोर्ट ने मामले को केवल झांसी तक सीमित नहीं रखा।







